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पिछले जन्म की इच्छा पूरी करने के लिए हिमालय पर बनाया गया था ‘सोने का महल’

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मोक्ष की प्राप्ति और जीवन का मर्म समझने के लिए इंसान को तपना पड़ता है. देश में कई ऐसे तपस्वी हुए, जिन्होंने अपने तप से पृथ्वी का रहस्य जानने की कोशिश की. यूं तो देश में कई तपस्वी हुए, मगर जिनके बारे में हम बात करने जा रहे हैं. वो अपने आप में ख़ास है. इनका नाम है लाहिड़ी महाराज. ये परमहंस योगानंद के गुरु युक्तेश्वरजी के गुरु थे. युक्तेश्वरजी ने लाहिड़ी महाराज के बारे में अनेक जानकारियां दी थीं, जो इस प्रकार से हैं.

युक्तेश्वर महाराज ने परमहंस योगानंद को बताया था कि उनके गुरू लाहिड़ी महाराज 31 साल की उम्र में रेलवे में काम करते थे. ऐसे में अंग्रेजी हुकुमत ने रानीखेत में जाने का आदेश दिया, 1861 में अंग्रेज सरकार के आदेश पर रानीखेत से अलमोड़ा पहुंच गए. ये जगह गुरु लाहिड़ी को बहुत ही ज़्यादा पसंद थी. वे अकसर घूमने निकल जाते थे.

सोने का महल दिखा

एक दिन भ्रमण करते हुए उन्हें अहसास हुआ कि उन्हें कोई पुकार रहा है. वे आवाज़ की दिशा में चल पड़े. वहां उन्हें अपनी ही उम्र का एक युवक चट्टान पर दिखाई दिया, जो उनके स्वागत के लिए अपने दोनों हाथ फैलाए हुए था. उस युवक ने लाहिड़ी से कुछ बातें की और उनके पूर्वजन्म के बारे में बताया. फ़िर उस अनजान आदमी ने कहा चलिए, गुरुदेव आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं. लाहिड़ी उस आदमी के पीछे-पीछे चल दिए. थोड़ी दूर चलने पर देखा कि पहाड़ी पर रोशनी दिखाई दे रही है. लाहिड़ी ने पूछा की यह रोशनी कैसी? उस आदमी ने उत्तर दिया कि ये सोने का महल है, जिसे गुरुदेव ने ख़ास तौर पर आपके लिए बनाया है.

पिछले जन्म की इच्छा थी

महल में प्रवेश करने पर लाहिड़ी महाराज को अहसास हुआ कि वे किसी देवलोक में आए हुए हैं. तभी अचानक उनकी मुलाक़ात एक महात्मा से हुई. उन्होंने कहा ‘पिछले जन्म में आपने कभी इस तरह के सोने के महल की सुंदरता का आनंद लेने की इच्छा जताई थी.’

महात्मा लाहिड़ी महाराज को दीक्षा देना चाहते थे. उन्होंने अपने साथ लाहिड़ी महाराज को पूरे महल का भ्रमण करवाया. इसके बाद उनको उस महल में क्रिया योग की दीक्षा दी.

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