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लोकसभा में बिना चर्चा के पारित हुआ बजट, कांग्रेस ने कहा लोकतंत्र के लिए काला दिन

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सरकार और विपक्षी पार्टियों के बीच गतिरोध के चलते लगातार आठ दिन से बाधित है संसद की कार्यवाही

नई दिल्ली: लोकसभा ने वित्त विधेयक, 2018 और एक अप्रैल से शुरू अगले वित्त वर्ष के लिए कुल 89.25 लाख करोड़ रुपए की व्यय योजनाओं को मंगलवार को बिना चर्चा के पारित कर दिया. विपक्षी दलों की नारेबाजी के बीच सदन ने सरकार की ओर से प्रस्तुत संबंधित प्रस्तावों को 25 मिनट में पारित कर दिया. हालांकि, कांग्रेस सहित विपक्षी पार्टियों ने सरकार के इस कदम को उसका अहंकार और देश में लोकतंत्र के लिए काला दिन बताया है.

वित्त मंत्री अरूण जेटली ने 2018-19 के लिए कराधान प्रस्तावों वाले विधेयक में 21 संशोधन प्रस्तुत किए थे जिन्हें ध्वनि मत से पारित किया गया. साथ ही 99 मंत्रालयों तथा विभागों के विनियोग विधेयक को भी बिना चर्चा के पारित किया गया. इसके साथ मोदी सरकार के पांचवें और अंतिम बजट की प्रक्रिया लोकसभा में पूरी हो गई है.

हाल के वर्षों में यह संभवत: पहली बार है कि लोकसभा ने एक भी मंत्रालय की अनुदान मांग ( व्यय योजना) पर चर्चा या मतदान नहीं किया. हाल के समय में 2013-014 और 2003-04 में भी बजट बिना चर्चा के पारित किए गए थे. आज सभी अनुदान मांगों को बिना चर्चा के (गिलोटीन के जरिए) पारित किया गया.

एक फरवरी को पेश वित्त वर्ष 2018-19 के इस बजट में जेटली ने सूचीबद्ध शेयरों पर दीर्घकालीन पूंजी लाभ कर फिर से लगाया है. उन्होंने बजट भाषण में कहा था कि एक लाख रुपए से अधिक के दीर्घकालीन पूंजी लाभ पर 10 प्रतिशत कर लगाया जाएगा. हालांकि, 31 जनवरी 2018 तक के सभी दीर्घकालीन लाभ को इससे छूट दी गई है. लोकसभा ने विनियोग विधेयक में विपक्षी दलों द्वारा लाए गए कटौती प्रस्तावों को भी अमान्य कर दिया.

बजट सत्र के दूसरे चरण में पंजाब नेशनल बैंक में सबसे बड़े बैंक धोखाधड़ी से कावेरी जल के विभाजन तथा आंध्र प्रदेश के लिए विशेष पैकेज समेत विभिन्न मुद्दों को लेकर विपक्षी दलों के संसद के कामकाज को बाधित किए जाने से सरकार ने बजट पारित कराने का फैसला किया. हालांकि सत्र छह अप्रैल तक चलना है.

सदन की बैठक कार्यवाही के दौरान पहली बार स्थगित होने के बाद वित्त विधेयक को पारित किया गया. कांग्रेस, रांकपा और तृणमूल कांग्रेस समेत विपक्षी दलों के सदस्य इसका विरोध करते हुए बर्हिगमन कर गए. तेदेपा, टीआरएस तथा वाईएसआर कांग्रेस के सदस्य अध्यक्ष के आसन के पास जा कर नारे लगाते नजर आए.

इससे पहले, कांग्रेस, तृणमूल, द्रमुक, राजद, सपा, वाम दल, रांकपा समेत अन्य ने लोसकभा अध्यक्ष को ज्ञापन देकर इस पर आपत्ति जतायी और सभी वित्तीय कार्यों को सदन में बिना किसी चर्चा पारित कराने की पहल को सरकार का अहंकार भरा और एकतरफा कदम बताया.

लोकसभा ने बाद में ध्वनि मत से 2017-18 की चौथे पूरक अनुदान मांगों को भी पारित कर दिया. विपक्षी दलों की नारेबाजी के बीच जेटली ने 2018 के वित्त विधेयक को पेश किया जिसमें कराधान प्रस्ताव शामिल है. साथ ही, उन्होंने आगमी वित्त वर्ष के लिए विनियोग विधेयक भी पेश किया जिसमें विभिन्न विभागों के व्यय का ब्योरा है.

तकनीकी रूप से दोनों विधेयकों को राज्यसभा भी जाना है लेकिन चूंकि ये धन विधेयक हैं, ऐसे में अगर उच्च सदन 14 दिन के भीतर नहीं लौटाता है, उसे पारित हुआ मान लिया जाएगा. राज्यसभा में विपक्षी दलों का बहुमत है जबकि लोकसभा में भाजपा के नेतृत्व वाली राजग गठबंधन के पास पूर्ण बहुमत है. पिछले आठ दिनों से हंगामे के कारण लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही बाधित है.

विपक्षी दलों ने बिना चर्चा के बजट पारित किए जाने का विरोध किया है. कांग्रेस ने शोरशराबे के बीच वित्त विधेयक पारित कराने को ‘‘प्रजातंत्र के लिए काला दिन’’ करार देते हुए आरोप लगाया कि सरकार चर्चा से भाग रही है और जनता की आवाज को दबाने का प्रयास किया जा रहा है. कांग्रेस नेता एवं लोकसभा में पार्टी के मुख्य सचेतक ज्योतिरादित्य सिंधिया ने इस बारे में कहा, ‘‘आज हमारे देश के प्रजातंत्र के लिए एक काला दिवस है.’’ उन्होंने कहा कि जिस तरीके से शोर-शराबे में वित्त मंत्रालय के सबसे महत्वपूर्ण विधेयक को पारित किया जा रहा है, उससे ‘‘आज हमारे प्रजातंत्र पर कलंक लग चुका है.’’

उन्होंने कहा कि हमने सदैव कहा है कि हम चर्चा चाहते हैं. पूरा विपक्ष एक ही मत पर इस विषय पर बोल रहा है. सारे विपक्षी दल एक साथ इसी गुहार के साथ लोकसभा अध्यक्ष के पास भी गए थे. हम चाहते हैं कि चर्चा हो, लेकिन सरकार के ही सहभागी दल सदन में आसन के समक्ष आकर शोर मचा रहे हैं और संसद की कार्यवाही को तहस-नहस कर रहे हैं.

सिंधिया ने कहा कि हम चाहते हैं कि पंजाब नेशनल बैंक में घोटाले के विषय पर सदन में चर्चा हो. हमने कार्य स्थगन प्रस्ताव के जरिए आवाज उठाई. उन्होंने सवाल किया कि क्या सरकार की जिम्मेदारी नहीं होती कि सदन के सारे दलों के साथ चर्चा की जाये ? लोकसभा अध्यक्ष ने एक बार सारी पार्टियों को बुलाया था, लेकिन सरकार और संसदीय कार्य मंत्री ने एक बार भी विपक्ष के किसी दल के साथ चर्चा नहीं की. उन्होंने कहा, ‘‘ यह सरकार के अहंकार का उदाहरण नहीं तो क्या है?’’

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