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डिनर विथ सोनिया’ के बाद विपक्ष को मिली ‘संजीवनी’, क्या 2019 के लिए तैयार हो रही जमीन

SP-Celebration-in-Gorakhpur

उपचुनावों के परिणामों को विपक्ष 2019 में होने वाले आम चुनावों के सेमीफाइनल के रूप में देख रहा है.

नई दिल्ली. बिहार और यूपी के उपचुनावों में भी राजस्थान और मध्यप्रदेश की तरह सत्तारूढ़ भाजपा को हार का सामना करना पड़ा है. ऐसे में जबकि विपक्षी पार्टियां संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी की डिनर पार्टी के बहाने एकजुट हो रही हैं और उपचुनावों के परिणामों को विपक्ष 2019 में होने वाले आम चुनावों के सेमीफाइनल के रूप में देख रहा है. भारतीय जनता पार्टी और राजग के उसके सहयोगी दल भौचक हैं. इसलिए फूलपुर के रुझान के बाद यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्या ने कहा भी, ‘हमें अपेक्षा नहीं थी कि बसपा के वोट सपा के हिस्से में चले जाएंगे. हम फाइनल रिजल्ट आने के बाद परिणामों की समीक्षा करेंगे.’ सिर्फ केशव प्रसाद मौर्या ही नहीं, गोरखपुर से सांसद रहे और वर्तमान में यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के लिए भी इस उपचुनाव की हार चौंका देने वाली है. क्योंकि पिछले लगभग तीन दशकों से गोरखपुर भाजपा का गढ़ रहा है और इस गढ़ को कुशलतापूर्वक योगी आदित्यनाथ ने संभाला है. यहां से उपचुनाव में भाजपा की हार होगी, इसका दूर-दूर तक अंदेशा पार्टी नेताओं को नहीं था. ऐसे में जबकि अब वे इस राज्य के मुख्यमंत्री भी हैं, उपचुनाव की हार उनके और उनकी पार्टी के लिए गंभीर चिंता का विषय है.

मंगलवार की रात संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी की डिनर पार्टी में जुटे थे 17 विपक्षी दलों के नेता.
मंगलवार की रात संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी की डिनर पार्टी में जुटे थे 17 विपक्षी दलों के नेता.

गोरखपुर में हार या रणनीति का खामियाजा
राजनीतिक रूप से सर्वाधिक चैतन्य माने जाने वाले उत्तर प्रदेश में भाजपा की हार की विवेचना आसान नहीं है. यह चुनाव में सामान्य हार थी या भाजपा चुनाव की रणनीति बनाने में विफल रही? गोरखपुर, जो सीएम योगी के कारण सबसे ज्यादा चर्चा में था, को देखें तो उपचुनाव से पहले ही यहां पर सीएम योगी की पसंद या नापसंद के प्रत्याशी को उतारने की बात चली थी. लेकिन पार्टी ने योगी के ही सहयोगी कहे गए उपेंद्र शुक्ला को टिकट दिया. चर्चा है कि चुनाव में शुक्ला को गोरखपुर के प्रतिष्ठित गोरक्षनाथ मंदिर से जुड़े होने का लाभ नहीं मिला. उन्हें मठ से बाहर का समझा गया. इसके अलावा समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के अचानक साथ आने का खामियाजा भी उन्हें भुगतना पड़ा.

गोरखपुर और फूलपुर में चुनावी जीत का पूरे यूपी में असर है. आगरा में जश्न मनाते सपा कार्यकर्ता.
गोरखपुर और फूलपुर में चुनावी जीत का पूरे यूपी में असर है. आगरा में जश्न मनाते सपा कार्यकर्ता.

फूलपुर में बाहरी उम्मीदवार ने बिगाड़ा गणित
अपनी स्थापना के बाद से भाजपा ने फूलपुर लोकसभा सीट पर जीत नहीं देखी थी. केशव प्रसाद मौर्या ने यह अवसर पार्टी को 2014 में दिया. इसका उन्हें लाभ भी मिला, वे विधानसभा चुनाव में पार्टी के ऐतिहासिक प्रदर्शन के बाद प्रदेश के डिप्टी सीएम बन गए. लेकिन जिस फूलपुर ने उन्हें सिर आंखों पर बिठाया, उसी ने उपचुनाव में भाजपा को झटका क्यों दिया, यह समझना मुश्किल नहीं है. फूलपुर लोकसभा क्षेत्र में बाहरी प्रत्याशी को नकारे जाने का रिकॉर्ड रहा है. साथ ही यहां कुर्मी वोट निर्णायक रहे हैं. यह बात जानते हुए भी भाजपा ने वाराणसी के मेयर रहे कौशलेंद्र सिंह पटेल को चुनाव में उतारा था. लेकिन उनके पटेल होने के बावजूद स्थानीय और सपा के प्रत्याशी नागेंद्र प्रताप सिंह पटेल को चुनावी लाभ मिला.

फूलपुर से जीते सपा प्रत्याशी नागेंद्र प्रताप सिंह पटेल.
फूलपुर से जीते सपा प्रत्याशी नागेंद्र प्रताप सिंह पटेल.

बिहार में भी राजग गठबंधन से नहीं जुड़ा जनमत
यूपी के अलावा बिहार के अररिया में भी उपचुनाव हो रहे थे. यहां से राजग गठबंधन के उम्मीदवार भाजपा के प्रदीप सिंह को राजद के सरफराज अहमद ने हराया. यह चुनाव हाल में सीएम नीतीश कुमार और भाजपा के एक साथ आने और राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के जेल जाने के बाद हो रहा था. इसलिए उपचुनाव में राजग गठबंधन की जीत से कम से कम सीएम नीतीश कुमार की छवि में सुधार के संकेत मिलते, लेकिन ऐसा हो न सका. अपनी जीत के बाद प्रमुख विपक्षी राजद अब सत्तारूढ़ राजग सरकार पर और ज्यादा हमलावर होगा, क्योंकि विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और राजद सुप्रीमो के बेटे तेजस्वी यादव लगातार नीतीश कुमार के खिलाफ प्रचार कर रहे हैं.

राजस्थान और मध्यप्रदेश में भी नहीं चला था जादू
यूपी के उपचुनावों से पहले मध्यप्रदेश और राजस्थान में भी सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को हार का सामना करना पड़ा था. मध्यप्रदेश में तो न सिर्फ अभी हाल में हुए दो विधानसभा सीटों कोलारस और मुंगावली सीटों पर भाजपा प्रत्याशियों को हार का सामना करना पड़ा था, बल्कि पिछले एक साल में दो अन्य लोकसभा सीटों पर भी पार्टी के प्रत्याशियों को कांग्रेस ने शिकस्त दी थी. इन दोनों विधानसभा सीटों से पहले चित्रकूट और अटेर में भी भाजपा उपचुनाव हार गई थी. वहीं, राजस्थान में लोकसभा की दो सीटों और विधानसभा की एक सीट के लिए उपचुनाव हुए थे. इनमें भी भाजपा के प्रत्याशियों को मुंह की खानी पड़ी थी. राजस्थान में तो प्रदेश सरकार में मंत्री रहे जसवंत सिंह यादव भी उम्मीदवार थे. उन्हें भी चुनाव में कांग्रेस ने हरा दिया था.

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