नई दिल्ली। न्यूजप्रिंट की अप्रत्याशित बढ़ती कीमतों की मार झेल रहे अखबारों के प्रतिनिधिमंडल ने सरकार से मदद की मांग की है। इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी के बैनर तले आठ सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने सूचना व प्रसारण मंत्री स्मृति इरानी से मिलकर कहा कि सरकारी विज्ञापन की दरों में बढ़ोतरी कर अखबारों को फौरी तौर पर राहत मुहैया कराने की सख्त जरूरत है। ईरानी ने प्रतिनिधिमंडल की मांगों पर विचार करने का आश्वासन दिया।

-पिछले एक साल में न्यूजप्रिंट की कीमतों में 40 फीसदी की उछाल

-इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी ने सरकार से की फौरी राहत की मांग

गौरतलब है कि न्यूजप्रिंट ( जिस कागज पर अखबार छपता है ) की कीमतें अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई है। हालत यह है कि जो न्यूजप्रिंट पिछले साल तक 33 हजार रुपये प्रति टन मिल रहा था, वह आज 52 हजार रुपये प्रति टन पहुंच गया है। यानी एक साल के भीतर कीमतों में लगभग 40 फीसदी का इजाफा हो गया है। आमदनी के स्त्रोत सीमित रहने और न्यूजप्रिंट की आकाश छूती कीमतों के कारण सभी अखबार मुश्किल के दौर से गुजर रहे हैं।

इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी के अध्यक्ष अकिला उरांकर के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल ने स्मृति इरानी को बताया कि जिस तरह से न्यूजप्रिंट के दाम बढ़ रहे हैं और विज्ञापन की दरें पहले जैसी ही हैं, उसमें अखबार निकालना संभव नहीं है। सरकारी विज्ञापन की दरों में संशोधन कर मदद आसानी से की जा सकती है। इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी में बड़े, मंझोले और छोटे सभी तरह के अखबार सदस्य हैं।

देश में न्यूजप्रिंट की कीमतों में अप्रत्याशित उछाल के पीछे असली वजह आयातित न्यूजप्रिंट है। दरअसल दुनिया में सबसे अधिक अखबारों का प्रकाशन करने वाले भारत में न्यूजप्रिंट की आधी जरूरतें आयात से पूरी होती है। भारत में हर साल 28 लाख टन न्यूजप्रिंट की खपत होती है, जबकि उत्पादन सिर्फ 14 लाख टन का ही होता है।

यूरोप में कई न्यूजप्रिंट उत्पादन करने वाली कंपनियों के बंद होने और चीन में रद्दी कागज के आयात पर प्रतिबंध लगने के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में न्यूजप्रिंट की कीमत बढ़ गई। हालत गंभीर इसीलिए भी हो गई कि आयातित न्यूजप्रिंट की बढ़ती कीमतों को देखते हुए देशी उत्पादकों ने भी न्यूजप्रिंट की कीमतें बढ़ा दी। ऐसे में अखबार के पास कोई चारा नहीं रहा। जबकि अखबार एक मात्र ऐसा उत्पाद है, जो असली लागत से काफी कम कीमत पर पाठकों को मुहैया कराया जाता है। आम जनता को जागरूक करने में अहम भूमिका निभाने वाले अखबारों का संकट लोकतंत्र के लिए भी सही नहीं है।